📿 श्लोक संग्रह

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि

गीता 4.27 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥
सर्वाणि
सभी
इन्द्रियकर्माणि
इन्द्रिय-क्रियाएँ
प्राणकर्माणि
प्राण की क्रियाएँ
और
अपरे
कुछ अन्य
आत्मसंयमयोगाग्नौ
आत्मसंयम-योग की अग्नि में
जुह्वति
आहुति देते हैं
ज्ञानदीपिते
ज्ञान से प्रज्वलित

कुछ साधक अपनी सभी इन्द्रिय-क्रियाएँ और प्राण-क्रियाएँ — साँस लेना-छोड़ना, देखना, सुनना — सब को ज्ञान से प्रज्वलित आत्मसंयम-योग की अग्नि में अर्पित कर देते हैं। इसका अर्थ है — हर क्रिया को साधना मान लेना। जैसे एक कुशल बर्तन बनाने वाला चाक घुमाने को भी ध्यान बना लेता है।

ज्ञान की अग्नि से प्रज्वलित संयम — यह बहुत ऊँची साधना है। बाहर सब होता है, भीतर सब शांत रहता है।

यह 4.25 से चली यज्ञ-सूची का तीसरा श्लोक है। इन्द्रिय-संयम को यज्ञ मानना — यह राजयोग की दिशा है।

अगले श्लोक (4.28) में द्रव्य, तप, योग और स्वाध्याय के यज्ञों का उल्लेख है।

अध्याय 4 · 27 / 42
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