कुछ साधक अपनी सभी इन्द्रिय-क्रियाएँ और प्राण-क्रियाएँ — साँस लेना-छोड़ना, देखना, सुनना — सब को ज्ञान से प्रज्वलित आत्मसंयम-योग की अग्नि में अर्पित कर देते हैं। इसका अर्थ है — हर क्रिया को साधना मान लेना। जैसे एक कुशल बर्तन बनाने वाला चाक घुमाने को भी ध्यान बना लेता है।
ज्ञान की अग्नि से प्रज्वलित संयम — यह बहुत ऊँची साधना है। बाहर सब होता है, भीतर सब शांत रहता है।