कृष्ण यहाँ एक सुन्दर बात कहते हैं — जो आसक्तिरहित है, जो मुक्त है, जिसका चित्त ज्ञान में टिका है, और जो यज्ञभाव से — यानी समर्पण के भाव से — कर्म करता है, उसके सारे कर्म विलीन हो जाते हैं। जैसे नदी का पानी समुद्र में मिलकर समाप्त नहीं होता, बल्कि बड़े में समा जाता है।
यज्ञभाव का अर्थ है — अपने कर्म को समर्पण मानकर करना, फल अपने पास नहीं रखना। इस भाव से किया कर्म बन्धन नहीं बनता।