📿 श्लोक संग्रह

गतसङ्गस्य मुक्तस्य

गीता 4.23 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥
गतसङ्गस्य
आसक्तिरहित का
मुक्तस्य
मुक्त व्यक्ति का
ज्ञानावस्थितचेतसः
ज्ञान में स्थित चित्त वाले का
यज्ञाय
यज्ञ के लिए
आचरतः
करने वाले का
कर्म
कर्म
समग्रम्
सम्पूर्ण
प्रविलीयते
विलीन हो जाता है

कृष्ण यहाँ एक सुन्दर बात कहते हैं — जो आसक्तिरहित है, जो मुक्त है, जिसका चित्त ज्ञान में टिका है, और जो यज्ञभाव से — यानी समर्पण के भाव से — कर्म करता है, उसके सारे कर्म विलीन हो जाते हैं। जैसे नदी का पानी समुद्र में मिलकर समाप्त नहीं होता, बल्कि बड़े में समा जाता है।

यज्ञभाव का अर्थ है — अपने कर्म को समर्पण मानकर करना, फल अपने पास नहीं रखना। इस भाव से किया कर्म बन्धन नहीं बनता।

यह श्लोक 4.19–4.22 में बताई गई ज्ञानयोगी की स्थिति का सार है। यज्ञ शब्द यहाँ अनुष्ठान से आगे — समर्पण के भाव के अर्थ में है।

अगला श्लोक (4.24) में ब्रह्म-यज्ञ का दर्शन आता है — सब कुछ ब्रह्म ही है।

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