जो बिना माँगे जो मिल जाए उसमें सन्तुष्ट है, सुख-दुख जैसे द्वन्द्वों से ऊपर है, किसी से ईर्ष्या नहीं करता, सफलता-असफलता में समान रहता है — वह कर्म करते हुए भी नहीं बँधता। यह वह अवस्था है जहाँ जीवन बोझ नहीं रहता।
जैसे पतंग आसमान में उड़ती है — हवा के साथ, हवा के विरुद्ध — लेकिन धागे से बँधी नहीं रहती जब धागा छूट जाए। इस श्लोक का मनुष्य ऐसे ही जीता है।