कृष्ण उस व्यक्ति का वर्णन करते हैं जो इच्छारहित है, मन और चित्त को वश में किए हुए है, सब परिग्रह (संचय) छोड़ चुका है — और केवल शरीर से ज़रूरी काम करता है। ऐसे व्यक्ति को कोई पाप या दोष नहीं लगता। जैसे जो खाना केवल शरीर की ज़रूरत के लिए खाता है, उसे स्वाद की लालसा नहीं होती।
यहाँ 'केवल शारीरिक कर्म' का अर्थ है — बस उतना करो जितना ज़रूरत है, संग्रह और लालसा से नहीं।