📿 श्लोक संग्रह

निराशीर्यतचित्तात्मा

गीता 4.21 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥
निराशीः
इच्छारहित
यतचित्तात्मा
वश में किया मन और बुद्धि वाला
त्यक्तसर्वपरिग्रहः
सब संग्रह छोड़ चुका
शारीरम्
शारीरिक
केवलम्
केवल
कर्म
कर्म
कुर्वन्
करते हुए
नहीं
आप्नोति
पाता
किल्बिषम्
पाप, दोष

कृष्ण उस व्यक्ति का वर्णन करते हैं जो इच्छारहित है, मन और चित्त को वश में किए हुए है, सब परिग्रह (संचय) छोड़ चुका है — और केवल शरीर से ज़रूरी काम करता है। ऐसे व्यक्ति को कोई पाप या दोष नहीं लगता। जैसे जो खाना केवल शरीर की ज़रूरत के लिए खाता है, उसे स्वाद की लालसा नहीं होती।

यहाँ 'केवल शारीरिक कर्म' का अर्थ है — बस उतना करो जितना ज़रूरत है, संग्रह और लालसा से नहीं।

यह श्लोक 4.20 का विस्तार है। वहाँ 'कर्म में लगा होने पर भी कुछ नहीं करता' — यहाँ उसकी व्याख्या है।

अगला श्लोक (4.22) इसी ज्ञानी व्यक्ति की समभाव वाली अवस्था का वर्णन करता है।

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