कृष्ण यहाँ उस व्यक्ति का चित्र खींचते हैं जो फल की आसक्ति छोड़ चुका है, सदा भीतर से तृप्त है, किसी पर निर्भर नहीं — फिर भी कर्म करता रहता है। और कहते हैं कि ऐसा व्यक्ति कर्म में होते हुए भी कुछ नहीं करता। जैसे हवा बादल को उड़ाती है, लेकिन हवा खुद कुछ नहीं पकड़ती।
यह अवस्था बहुत ऊँची है — भीतर कोई चाहत नहीं, कोई चिंता नहीं, पर काम पूरा होता रहता है। यही निष्काम कर्मयोग की परिपक्वता है।