📿 श्लोक संग्रह

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गम्

गीता 4.20 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ॥
त्यक्त्वा
त्यागकर
कर्मफलासङ्गम्
कर्म के फल की आसक्ति
नित्यतृप्तः
सदा तृप्त
निराश्रयः
किसी आश्रय पर निर्भर नहीं
कर्मणि
कर्म में
अभिप्रवृत्तः
लगा हुआ
अपि
होते हुए भी
न एव
नहीं
किञ्चित्
कुछ भी
करोति
करता है
सः
वह

कृष्ण यहाँ उस व्यक्ति का चित्र खींचते हैं जो फल की आसक्ति छोड़ चुका है, सदा भीतर से तृप्त है, किसी पर निर्भर नहीं — फिर भी कर्म करता रहता है। और कहते हैं कि ऐसा व्यक्ति कर्म में होते हुए भी कुछ नहीं करता। जैसे हवा बादल को उड़ाती है, लेकिन हवा खुद कुछ नहीं पकड़ती।

यह अवस्था बहुत ऊँची है — भीतर कोई चाहत नहीं, कोई चिंता नहीं, पर काम पूरा होता रहता है। यही निष्काम कर्मयोग की परिपक्वता है।

4.19 में पण्डित का लक्षण बताया था। यहाँ उसकी कर्मशैली बताई जाती है — वह कर्म करता है, पर फल की चाहत नहीं।

अगला श्लोक (4.21) इसी का विस्तार है — शरीर से काम, मन से संन्यास।

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