📿 श्लोक संग्रह

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यम्

गीता 4.17 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥
कर्मणः
कर्म को
हि
निश्चय ही
अपि
भी
बोद्धव्यम्
जानना चाहिए
विकर्मणः
निषिद्ध कर्म को
अकर्मणः
अकर्म को
और
गहना
गहरी, जटिल
गतिः
गति, स्वरूप

कृष्ण तीन चीजें बताते हैं जो जाननी ज़रूरी हैं — कर्म (कर्तव्य कर्म), विकर्म (निषिद्ध कर्म), और अकर्म (कर्म न करना)। कर्म की गति बड़ी गहरी और जटिल है — जैसे नदी के भीतर की धाराएँ ऊपर से नहीं दिखतीं।

यह श्लोक एक चेतावनी भी है — बिना समझे कर्म करना भटकाता है। समझकर किया कर्म ही सही फल देता है।

यह श्लोक 4.16 में उठाए प्रश्न को और गहरा करता है। कर्म की गहनता को स्वीकार करना ही पहला कदम है।

अगला श्लोक (4.18) इसका उत्तर देता है — अकर्म में कर्म देखना और कर्म में अकर्म देखना ही ज्ञान है।

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