कृष्ण तीन चीजें बताते हैं जो जाननी ज़रूरी हैं — कर्म (कर्तव्य कर्म), विकर्म (निषिद्ध कर्म), और अकर्म (कर्म न करना)। कर्म की गति बड़ी गहरी और जटिल है — जैसे नदी के भीतर की धाराएँ ऊपर से नहीं दिखतीं।
यह श्लोक एक चेतावनी भी है — बिना समझे कर्म करना भटकाता है। समझकर किया कर्म ही सही फल देता है।