📿 श्लोक संग्रह

किं कर्म किमकर्मेति

गीता 4.16 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥
किम्
क्या है
कर्म
कर्म
किम् अकर्म
अकर्म क्या है
कवयः
बुद्धिमान, विद्वान
अपि
भी
अत्र
यहाँ
मोहिताः
मोहित, भ्रमित
तत्
वह
प्रवक्ष्यामि
मैं बताऊँगा
यत्
जिसे
ज्ञात्वा
जानकर
मोक्ष्यसे
मुक्त होओगे
अशुभात्
अशुभ से, बुरे से

कृष्ण कहते हैं — कर्म क्या है और अकर्म क्या है — यह बड़े-बड़े बुद्धिमान लोग भी नहीं समझ पाते। यह विषय इतना गहरा है कि भटकना स्वाभाविक है। लेकिन मैं तुम्हें वह बताऊँगा जिसे जानकर तुम बुराई से मुक्त हो जाओगे।

यह वचन बड़ा सांत्वना देने वाला है — जो बात बुद्धिमानों को भी उलझाती है, उसे स्वयं कृष्ण सरल करके बताएँगे। गुरु का यही काम है — जटिल को सरल बनाना।

यह श्लोक कर्म-अकर्म-विकर्म की चर्चा शुरू करता है जो 4.17 और 4.18 में आगे बढ़ती है।

परम्परा में यह खंड गीता के सबसे सूक्ष्म विषयों में से एक माना जाता रहा है — शरीर बैठा हो पर मन काम में हो, या शरीर काम करे पर मन शांत हो?

अध्याय 4 · 16 / 42
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