📿 श्लोक संग्रह

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म

गीता 4.15 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥
एवम्
इस प्रकार
ज्ञात्वा
जानकर
कृतम्
किया गया
कर्म
कर्म
पूर्वैः
पूर्वजों ने
मुमुक्षुभिः
मुक्ति चाहने वालों ने
कुरु
करो
कर्म एव
कर्म ही
तस्मात्
इसलिए
त्वम्
तुम
पूर्वतरम्
बहुत पहले से

कृष्ण अर्जुन को प्रेरणा देते हैं — यह ज्ञान जानकर ही पुराने मुमुक्षुओं ने कर्म किए और मुक्ति पाई। इसलिए तुम भी कर्म करो। यह वैसे ही है जैसे कोई बुजुर्ग कहे — हमारे दादा-परदादा ने इसी तरह खेती की और खूब फसल पाई, तुम भी उसी रास्ते पर चलो।

परम्परा का यह सहारा बड़ा सुंदर है। अकेले नई राह बनाना कठिन है, लेकिन जब पता हो कि इस रास्ते पर अनेक लोग चल चुके हैं — तो हिम्मत बनी रहती है।

यहाँ कृष्ण 4.13 और 4.14 में बताए गए ज्ञान को व्यावहारिक रूप देते हैं। सैद्धांतिक ज्ञान के बाद आदेश — कर्म करो।

अगला श्लोक (4.16) एक नया प्रश्न उठाता है — आखिर कर्म और अकर्म क्या होते हैं?

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