यह श्लोक बड़ी गहरी बात कहता है। जो कर्म करते हुए भी भीतर से अकर्ता रहता है — यानी 'मैं कर रहा हूँ' का अहंकार नहीं रखता — वह कर्म में अकर्म देखता है। और जो बैठा भी हो लेकिन मन में इच्छाएँ और संकल्प उठते रहें — वह अकर्म में भी कर्म करता है। ऐसा पहला व्यक्ति बुद्धिमान है।
यह भेद बहुत सूक्ष्म है। बाहर का काम नहीं, भीतर का भाव — यही कर्म और अकर्म का असली निर्णायक है।