📿 श्लोक संग्रह

कर्मण्यकर्म यः पश्येत्

गीता 4.18 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥
कर्मणि
कर्म में
अकर्म
अकर्म (कर्ता-भाव न होना)
यः
जो
पश्येत्
देखता है
अकर्मणि
अकर्म में
और
कर्म
कर्म का भाव
वह
बुद्धिमान्
बुद्धिमान
मनुष्येषु
मनुष्यों में
युक्तः
योगयुक्त
कृत्स्नकर्मकृत्
समस्त कर्मों को करने वाला

यह श्लोक बड़ी गहरी बात कहता है। जो कर्म करते हुए भी भीतर से अकर्ता रहता है — यानी 'मैं कर रहा हूँ' का अहंकार नहीं रखता — वह कर्म में अकर्म देखता है। और जो बैठा भी हो लेकिन मन में इच्छाएँ और संकल्प उठते रहें — वह अकर्म में भी कर्म करता है। ऐसा पहला व्यक्ति बुद्धिमान है।

यह भेद बहुत सूक्ष्म है। बाहर का काम नहीं, भीतर का भाव — यही कर्म और अकर्म का असली निर्णायक है।

यह श्लोक 4.16 और 4.17 में उठाए कर्म-अकर्म के प्रश्न का उत्तर है। ज्ञानयोग का सार यहाँ एक वाक्य में आ जाता है।

अगला श्लोक (4.19) उस व्यक्ति के लक्षण बताता है जिसने यह अकर्ता-भाव प्राप्त कर लिया है।

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