कृष्ण कहते हैं — कर्म मुझे नहीं छूते, क्योंकि मुझे फल की इच्छा नहीं है। जब इच्छा नहीं तो बन्धन नहीं। जैसे कमल पानी में रहता है पर पानी उसे भिगोता नहीं — वैसे ही जो फल की चाहत से रहित होकर काम करता है, उसे कर्म नहीं बाँधते।
जो इस सत्य को जान लेता है वह भी कर्मों से नहीं बँधता। यह केवल ईश्वर का विशेषाधिकार नहीं है — यह वह स्थिति है जो ज्ञान से कोई भी पा सकता है।