📿 श्लोक संग्रह

न मां कर्माणि लिम्पन्ति

गीता 4.14 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥
न माम्
मुझे नहीं
कर्माणि
कर्म
लिम्पन्ति
लिपटते हैं, स्पर्श करते हैं
न मे
मेरी नहीं
कर्मफले
कर्म के फल में
स्पृहा
इच्छा, लालसा
इति
इस प्रकार
यः
जो
अभिजानाति
भली-भाँति जानता है
वह
बध्यते
बंधता है

कृष्ण कहते हैं — कर्म मुझे नहीं छूते, क्योंकि मुझे फल की इच्छा नहीं है। जब इच्छा नहीं तो बन्धन नहीं। जैसे कमल पानी में रहता है पर पानी उसे भिगोता नहीं — वैसे ही जो फल की चाहत से रहित होकर काम करता है, उसे कर्म नहीं बाँधते।

जो इस सत्य को जान लेता है वह भी कर्मों से नहीं बँधता। यह केवल ईश्वर का विशेषाधिकार नहीं है — यह वह स्थिति है जो ज्ञान से कोई भी पा सकता है।

पिछले श्लोक (4.13) में कृष्ण ने स्वयं को अकर्ता बताया था। यहाँ वे उसका कारण देते हैं — फल की इच्छा न होना।

अगला श्लोक (4.15) बताता है कि पूर्वजों ने इसी सत्य को जानकर कर्म किए थे और हमें भी वैसे ही करने चाहिए।

अध्याय 4 · 14 / 42
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