📿 श्लोक संग्रह

ये यथा मां प्रपद्यन्ते

गीता 4.11 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥
ये
जो
यथा
जैसे
माम्
मुझे
प्रपद्यन्ते
शरण लेते हैं, भजते हैं
तान्
उन्हें
तथा एव
उसी प्रकार
भजामि
मैं भजता हूँ, अनुग्रह करता हूँ
मम
मेरे
वर्त्म
मार्ग का
अनुवर्तन्ते
अनुसरण करते हैं
मनुष्याः
मनुष्य
सर्वशः
सब प्रकार से

यह श्लोक गीता के सबसे सुंदर वचनों में से एक है। कृष्ण कहते हैं — जो जैसे मुझे शरण में आता है, मैं उसे उसी रूप में अपनाता हूँ। ज्ञानी ज्ञान से मिलते हैं, भक्त प्रेम से मिलते हैं, कर्मयोगी कर्म से मिलते हैं — सभी मुझे ही पाते हैं। ईश्वर का द्वार सबके लिए खुला है।

दूसरी बात यह है — सभी मनुष्य किसी-न-किसी रूप में मेरे ही मार्ग पर चलते हैं। कोई सीधे, कोई घुमावदार रास्ते से — पर सब उसी की ओर जा रहे हैं जो इस सृष्टि का मूल है।

यह श्लोक सभी उपासना पद्धतियों की समानता का संकेत देता है। ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग — सभी एक ही लक्ष्य की ओर हैं।

परम्परा में यह श्लोक यह समझाने के लिए उद्धृत किया जाता रहा है कि ईश्वर किसी एक रूप या मार्ग तक सीमित नहीं है।

अध्याय 4 · 11 / 42
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