📿 श्लोक संग्रह

काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिम्

गीता 4.12 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥
काङ्क्षन्तः
चाहने वाले
कर्मणाम्
कर्मों की
सिद्धिम्
सफलता
यजन्ते
यजन करते हैं, पूजते हैं
इह
यहाँ इस संसार में
देवताः
देवताओं को
क्षिप्रम्
शीघ्र
मानुषे लोके
मनुष्य लोक में
सिद्धिः
सफलता
कर्मजा
कर्म से उत्पन्न

कृष्ण यहाँ एक व्यावहारिक बात कहते हैं। जो लोग इस संसार में अपने कर्मों का फल जल्दी चाहते हैं, वे देवताओं की उपासना करते हैं — और उन्हें शीघ्र फल भी मिलता है। यह कोई निंदा नहीं, बस एक तथ्य है। जैसे कोई परीक्षा की तैयारी के लिए पड़ोस के अनुभवी गुरुजी के पास जाए।

इस श्लोक में यह संकेत भी है कि सांसारिक फल और परम मोक्ष — दो अलग लक्ष्य हैं। देवोपासना सांसारिक फल देती है, परम भाव को नहीं।

यह श्लोक 4.11 के बाद आता है जहाँ कृष्ण ने कहा था कि सभी मार्ग मुझ तक ही पहुँचते हैं। यहाँ वे बताते हैं कि अलग-अलग उपासना के अलग-अलग फल हैं।

अगला श्लोक (4.13) में गुण और कर्म के आधार पर चार वर्णों की रचना का वर्णन है।

अध्याय 4 · 12 / 42
अध्याय 4 · 12 / 42 अगला →