कृष्ण यहाँ एक व्यावहारिक बात कहते हैं। जो लोग इस संसार में अपने कर्मों का फल जल्दी चाहते हैं, वे देवताओं की उपासना करते हैं — और उन्हें शीघ्र फल भी मिलता है। यह कोई निंदा नहीं, बस एक तथ्य है। जैसे कोई परीक्षा की तैयारी के लिए पड़ोस के अनुभवी गुरुजी के पास जाए।
इस श्लोक में यह संकेत भी है कि सांसारिक फल और परम मोक्ष — दो अलग लक्ष्य हैं। देवोपासना सांसारिक फल देती है, परम भाव को नहीं।