यह श्लोक गीता के सबसे सुंदर वचनों में से एक है। कृष्ण कहते हैं — जो जैसे मुझे शरण में आता है, मैं उसे उसी रूप में अपनाता हूँ। ज्ञानी ज्ञान से मिलते हैं, भक्त प्रेम से मिलते हैं, कर्मयोगी कर्म से मिलते हैं — सभी मुझे ही पाते हैं। ईश्वर का द्वार सबके लिए खुला है।
दूसरी बात यह है — सभी मनुष्य किसी-न-किसी रूप में मेरे ही मार्ग पर चलते हैं। कोई सीधे, कोई घुमावदार रास्ते से — पर सब उसी की ओर जा रहे हैं जो इस सृष्टि का मूल है।