कृष्ण बताते हैं कि पहले भी बहुत-से लोग राग, भय और क्रोध छोड़कर, मुझमें मन लगाकर, मेरी शरण में आकर, ज्ञान और तप से पवित्र होकर मेरे भाव को प्राप्त हुए। यह मार्ग पुराना है और इस पर कई यात्री चल चुके हैं। जैसे पहाड़ पर पुराना रास्ता होता है जिस पर अनेक पग-चिह्न हों।
राग, भय और क्रोध — ये तीन बाधाएँ मन को शांत नहीं होने देतीं। जब ये तीनों कम होते हैं तो मन भीतर की शांति पा सकता है।