📿 श्लोक संग्रह

वीतरागभयक्रोधाः

गीता 4.10 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥
वीतरागभयक्रोधाः
राग, भय और क्रोध से रहित
मन्मयाः
मुझमें तल्लीन
माम्
मेरी
उपाश्रिताः
शरण लिए हुए
बहवः
बहुत-से लोग
ज्ञानतपसा
ज्ञान और तप से
पूताः
पवित्र होकर
मद्भावम्
मेरे भाव को, मेरी अवस्था को
आगताः
प्राप्त हुए

कृष्ण बताते हैं कि पहले भी बहुत-से लोग राग, भय और क्रोध छोड़कर, मुझमें मन लगाकर, मेरी शरण में आकर, ज्ञान और तप से पवित्र होकर मेरे भाव को प्राप्त हुए। यह मार्ग पुराना है और इस पर कई यात्री चल चुके हैं। जैसे पहाड़ पर पुराना रास्ता होता है जिस पर अनेक पग-चिह्न हों।

राग, भय और क्रोध — ये तीन बाधाएँ मन को शांत नहीं होने देतीं। जब ये तीनों कम होते हैं तो मन भीतर की शांति पा सकता है।

पिछले श्लोक (4.9) में कृष्ण ने बताया था कि उनके दिव्य जन्म-कर्म को जानने वाला मोक्ष पाता है। यहाँ वे उदाहरण देते हैं कि ऐसे लोग पहले भी हुए हैं।

अगला श्लोक (4.11) में एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत आता है — जो जैसे मुझे भजते हैं, मैं उन्हें उसी रूप में मिलता हूँ।

अध्याय 4 · 10 / 42
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