📿 श्लोक संग्रह

इमं विवस्वते योगं

गीता 4.1 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥
इमम्
इस
विवस्वते
सूर्यदेव (विवस्वान्) को
योगम्
योग को
प्रोक्तवान्
कहा, सिखाया
अहम्
मैंने
अव्ययम्
अविनाशी, शाश्वत
मनवे
मनु को
प्राह
कहा
मनुः
मनु ने
इक्ष्वाकवे
इक्ष्वाकु को
अब्रवीत्
बताया

भगवान कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि यह अविनाशी योग उन्होंने सबसे पहले सूर्यदेव विवस्वान् को दिया था। विवस्वान् ने यही ज्ञान मनु को दिया, और मनु ने राजा इक्ष्वाकु को। इस तरह यह ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहा — जैसे घर का दीपक एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को जलता हुआ मिलता है।

इस श्लोक से पता चलता है कि गीता का यह उपदेश कोई नई बात नहीं है। यह बहुत पुराना ज्ञान है जो राजऋषियों की परंपरा में रहा। कृष्ण इसे अर्जुन तक फिर से पहुँचा रहे हैं।

यह श्लोक चौथे अध्याय का पहला श्लोक है। कृष्ण यहाँ इस योग की प्राचीनता और परम्परा बताकर इसकी प्रामाणिकता सिद्ध करते हैं।

अगले श्लोक (4.2) में कृष्ण बताते हैं कि यह परम्परा लम्बे समय में कैसे टूट गई थी।

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