यहाँ 'यज्ञ' शब्द का अर्थ केवल हवन नहीं है। यज्ञ यानी ऐसा कर्म जो समाज के लिए, परमात्मा के लिए, किसी बड़े उद्देश्य के लिए हो — अपने लिए नहीं। ऐसा कर्म बंधन नहीं बनाता।
कृष्ण अर्जुन को 'मुक्तसंग' होकर कर्म करने को कहते हैं — यानी आसक्ति छोड़कर। जब कर्म का उद्देश्य बड़ा हो और लगाव न हो, तो वह कर्म मुक्ति का मार्ग बन जाता है।