📿 श्लोक संग्रह

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र

गीता 3.9 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥
यज्ञार्थात्
यज्ञ के लिए
कर्मणः अन्यत्र
उस कर्म के अतिरिक्त
लोकः अयम्
यह संसार
कर्मबन्धनः
कर्म से बँधा हुआ
तदर्थम्
उसके लिए — यज्ञ के लिए
कर्म
कर्म
कौन्तेय
हे कुंती-पुत्र (अर्जुन)
मुक्तसङ्गः
आसक्ति-रहित होकर
समाचर
करो — आचरण करो

यहाँ 'यज्ञ' शब्द का अर्थ केवल हवन नहीं है। यज्ञ यानी ऐसा कर्म जो समाज के लिए, परमात्मा के लिए, किसी बड़े उद्देश्य के लिए हो — अपने लिए नहीं। ऐसा कर्म बंधन नहीं बनाता।

कृष्ण अर्जुन को 'मुक्तसंग' होकर कर्म करने को कहते हैं — यानी आसक्ति छोड़कर। जब कर्म का उद्देश्य बड़ा हो और लगाव न हो, तो वह कर्म मुक्ति का मार्ग बन जाता है।

यह श्लोक यज्ञ-चक्र की व्याख्या का आरंभ है जो 3.10 से 3.16 तक चलती है। 'यज्ञ' की विस्तृत परिभाषा गीता 4.24–4.33 में मिलती है।

गीता में कर्म को यज्ञ-भाव से करना ही कर्मयोग का सार है — यह पूरे तीसरे अध्याय का केंद्रीय संदेश है।

अध्याय 3 · 9 / 43
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