📿 श्लोक संग्रह

नियतं कुरु कर्म त्वम्

गीता 3.8 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥
नियतम्
नियत — निर्धारित कर्तव्य
कुरु
करो
कर्म
कर्म
त्वम्
तुम
ज्यायः
श्रेष्ठ — बेहतर
हि
निश्चय ही
अकर्मणः
कर्म न करने से
शरीरयात्रा अपि
शरीर का पालन भी
न प्रसिद्ध्येत्
सिद्ध नहीं होगा — नहीं चलेगा

कृष्ण यहाँ सीधे आदेश देते हैं — अपना नियत कर्म करो। 'नियत' का अर्थ है — जो तुम्हारे स्वभाव और स्थिति के अनुसार तय है, जो तुम्हारा कर्तव्य है। अर्जुन के लिए यह युद्ध है। कर्म न करना कर्म करने से कमजोर है।

एक बहुत व्यावहारिक बात भी कही — शरीर को जीवित रखना भी तो कर्म पर निर्भर है। खाना, पानी, सोना — ये सब कर्म हैं। बिना कर्म के शरीर भी नहीं चलता।

यह 3.4–3.7 का व्यावहारिक निष्कर्ष है। कर्म न करना संभव नहीं — तो फिर नियत कर्म ही करो।

गीता 18.45 में भी 'स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः' कहकर अपने कर्म में संलग्न रहने की बात आती है।

अध्याय 3 · 8 / 43
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