📿 श्लोक संग्रह

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा

गीता 3.7 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥
यः तु
परंतु जो
इन्द्रियाणि
इंद्रियों को
मनसा
मन से
नियम्य
नियंत्रित करके
आरभते
आरंभ करता है — करता है
कर्मेन्द्रियैः
कर्मेंद्रियों से — कर्म करने वाले अंगों से
कर्मयोगम्
कर्मयोग को
असक्तः
अनासक्त — बिना लगाव के
सः विशिष्यते
वह श्रेष्ठ है

3.6 में जो गलत था — वह बताया। अब यहाँ सही मार्ग है। जो व्यक्ति मन से इंद्रियों को नियंत्रित करके, अनासक्त भाव से कर्म करता है — वही सच्चा कर्मयोगी है। यह 'विशिष्यते' शब्द बताता है कि वह सबसे अलग और श्रेष्ठ है।

यहाँ दो बातें साथ हैं — नियंत्रण (इंद्रियों पर मन का) और अनासक्ति (फल की चाह नहीं)। ये दोनों मिलकर कर्मयोग बनाते हैं। अकेला नियंत्रण या अकेली अनासक्ति पर्याप्त नहीं।

यह 3.6 का सकारात्मक विकल्प है। गीता में यह क्रम — पहले गलत दिखाओ, फिर सही बताओ — बार-बार आता है।

गीता 6.1 में भी कर्मयोगी की यही परिभाषा मिलती है — जो फल की आशा के बिना कर्म करता है।

अध्याय 3 · 7 / 43
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