यहाँ एक बहुत साफ बात कही गई है। अगर कोई हाथ-पैर से काम नहीं करता, बस बैठा रहता है — लेकिन मन में सांसारिक विषय चलते रहते हैं — तो वह ढोंगी है। बाहरी त्याग और भीतरी आसक्ति — यह स्थिति खतरनाक है।
कृष्ण इसे 'मिथ्याचार' कहते हैं। मिथ्या यानी झूठा आचरण। जब बाहर और भीतर एक नहीं होते, तो साधना का कोई अर्थ नहीं। असली साधना वह है जहाँ बाहरी कर्म और भीतरी भाव एक हों।