📿 श्लोक संग्रह

न हि कश्चित्क्षणमपि

गीता 3.5 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥
न हि
निश्चित रूप से नहीं
कश्चित्
कोई भी
क्षणम् अपि
क्षण भर भी
जातु
कभी भी
तिष्ठति अकर्मकृत्
बिना कर्म के रहता है
कार्यते
करवाया जाता है
अवशः
विवश होकर — बिना चाहे
कर्म
कर्म
सर्वः
सभी
प्रकृतिजैः गुणैः
प्रकृति से उत्पन्न गुणों द्वारा

यह श्लोक बहुत सरल सत्य कहता है। हर प्राणी हर क्षण कुछ न कुछ करता ही है — श्वास लेना भी कर्म है, सोचना भी कर्म है। पूर्ण निष्क्रियता संभव नहीं। शरीर में रहते हुए कर्म होता रहता है।

कृष्ण कहते हैं — सब लोग प्रकृति के गुणों से विवश होकर कर्म करते हैं। सत्व, रज और तम — ये तीन गुण सदा सक्रिय हैं। जो यह नहीं जानता, वह सोचता है 'मैं बैठा हूँ' — पर भीतर मन दौड़ रहा होता है।

यह श्लोक 3.4 की व्याख्या है — कर्म छोड़ने की बात असंभव है। गीता 13.21 में भी गुणों की यही भूमिका बताई गई है।

आधुनिक मनोविज्ञान भी मानता है कि मन निरंतर सक्रिय है — गीता यह बात हजारों वर्ष पहले कह चुकी है।

अध्याय 3 · 5 / 43
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