📿 श्लोक संग्रह

न कर्मणामनारम्भात्

गीता 3.4 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥
नहीं
कर्मणाम् अनारम्भात्
कर्मों को न करने से
नैष्कर्म्यम्
कर्म-रहित अवस्था — निष्कर्मता
पुरुषः अश्नुते
मनुष्य को प्राप्त होती है
न च
और न ही
सन्न्यसनात् एव
केवल संन्यास लेने से
सिद्धिम्
सिद्धि को — पूर्णता को
समधिगच्छति
प्राप्त करता है

कृष्ण यहाँ एक गलत धारणा तोड़ते हैं। बहुत लोग सोचते हैं — कर्म छोड़ दो, तो मुक्ति मिलेगी। लेकिन केवल बाहर से कर्म रोकने से भीतर का मन नहीं रुकता। निष्कर्मता मन की अवस्था है, शरीर की नहीं।

दूसरी बात — केवल संन्यास लेने से भी सिद्धि नहीं होती। संन्यास वेश और मन की वास्तविक अनासक्ति दो अलग बातें हैं। गीता की दृष्टि में कर्म का त्याग नहीं, कर्म में आसक्ति का त्याग साधना है।

यह श्लोक 3.3 की व्याख्या है। कर्मयोग का मार्ग केवल बाहरी त्याग नहीं, भीतरी अनासक्ति है — यही गीता का केंद्रीय संदेश है।

गीता 5.6 में भी यही बात आती है — बिना योग के संन्यास दुःखदायी है।

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