कृष्ण यहाँ एक गलत धारणा तोड़ते हैं। बहुत लोग सोचते हैं — कर्म छोड़ दो, तो मुक्ति मिलेगी। लेकिन केवल बाहर से कर्म रोकने से भीतर का मन नहीं रुकता। निष्कर्मता मन की अवस्था है, शरीर की नहीं।
दूसरी बात — केवल संन्यास लेने से भी सिद्धि नहीं होती। संन्यास वेश और मन की वास्तविक अनासक्ति दो अलग बातें हैं। गीता की दृष्टि में कर्म का त्याग नहीं, कर्म में आसक्ति का त्याग साधना है।