📿 श्लोक संग्रह

लोकेऽस्मिन् द्विविधा

गीता 3.3 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥
लोके अस्मिन्
इस संसार में
द्विविधा
दो प्रकार की
निष्ठा
स्थिति — मार्ग
पुरा
पहले — आदि में
प्रोक्ता मया
मेरे द्वारा कही गई
अनघ
हे निष्पाप (अर्जुन)
ज्ञानयोगेन
ज्ञान के मार्ग से
साङ्ख्यानाम्
सांख्य विचारकों के लिए
कर्मयोगेन
कर्म के मार्ग से
योगिनाम्
योगियों के लिए

यहाँ कृष्ण अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हैं। वे कहते हैं — यह दो मार्गों की बात नई नहीं है। मैंने पहले से ही दो मार्ग बताए हैं — सांख्यों के लिए ज्ञानयोग और योगियों के लिए कर्मयोग। अर्जुन को 'अनघ' कहकर पुकारा — यानी निष्पाप।

यह श्लोक स्पष्ट करता है कि ज्ञान और कर्म दोनों मार्ग वैध हैं। एक व्यक्ति की स्वभाव और परिस्थिति तय करती है कि कौन-सा मार्ग उसके लिए उचित है।

गीता के इस श्लोक में 'पुरा प्रोक्ता मया' से संकेत है कि ये शिक्षाएँ सनातन हैं — केवल इस युद्धभूमि की नहीं।

सांख्य परंपरा में ज्ञान को मुक्ति का मार्ग माना गया है, जबकि योग परंपरा में कर्म को — गीता दोनों को मान्यता देती है।

अध्याय 3 · 3 / 43
अध्याय 3 · 3 / 43 अगला →