📿 श्लोक संग्रह

व्यामिश्रेणेव वाक्येन

गीता 3.2 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥
व्यामिश्रेण
मिली-जुली — अस्पष्ट
वाक्येन
वाणी से — बात से
बुद्धिम्
बुद्धि को
मोहयसि
भ्रमित करते हो
इव
जैसे — मानो
तत् एकम्
वह एक बात
वद
बताओ — कहो
निश्चित्य
निश्चय करके
येन
जिससे
श्रेयः आप्नुयाम्
कल्याण प्राप्त करूँ

अर्जुन का यह दूसरा प्रश्न और भी सीधा है। वे कहते हैं — तुम्हारी बातें मिली-जुली हैं, मेरी समझ में नहीं आ रहीं। एक निश्चित बात बताओ जिससे मेरा भला हो। यह प्रश्न किसी भी शिष्य का हो सकता है।

यहाँ 'इव' शब्द महत्वपूर्ण है — अर्जुन पूरी तरह आरोप नहीं लगा रहे, बस विनम्रता से कह रहे हैं 'मानो भ्रमित हो रहा हूँ'। यह उनकी शिष्य-भावना दिखाता है।

यह श्लोक 3.1 की निरंतरता है। अर्जुन दोनों मार्गों — ज्ञान और कर्म — के बीच उलझे हैं और स्पष्टता चाहते हैं।

कृष्ण का उत्तर 3.3 से शुरू होता है और पूरे अध्याय में फैला है — यह संवाद गीता का केंद्रीय संवाद है।

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