3.6 में जो गलत था — वह बताया। अब यहाँ सही मार्ग है। जो व्यक्ति मन से इंद्रियों को नियंत्रित करके, अनासक्त भाव से कर्म करता है — वही सच्चा कर्मयोगी है। यह 'विशिष्यते' शब्द बताता है कि वह सबसे अलग और श्रेष्ठ है।
यहाँ दो बातें साथ हैं — नियंत्रण (इंद्रियों पर मन का) और अनासक्ति (फल की चाह नहीं)। ये दोनों मिलकर कर्मयोग बनाते हैं। अकेला नियंत्रण या अकेली अनासक्ति पर्याप्त नहीं।