यह श्लोक बहुत सरल सत्य कहता है। हर प्राणी हर क्षण कुछ न कुछ करता ही है — श्वास लेना भी कर्म है, सोचना भी कर्म है। पूर्ण निष्क्रियता संभव नहीं। शरीर में रहते हुए कर्म होता रहता है।
कृष्ण कहते हैं — सब लोग प्रकृति के गुणों से विवश होकर कर्म करते हैं। सत्व, रज और तम — ये तीन गुण सदा सक्रिय हैं। जो यह नहीं जानता, वह सोचता है 'मैं बैठा हूँ' — पर भीतर मन दौड़ रहा होता है।