📿 श्लोक संग्रह

एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा

गीता 3.43 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥
एवम्
इस प्रकार
बुद्धेः परम्
बुद्धि से परे को
बुद्ध्वा
जानकर
संस्तभ्य
दृढ़ करके — स्थिर करके
आत्मानम् आत्मना
आत्मा से मन को — स्वयं से स्वयं को
जहि
मारो — जीतो
शत्रुम्
शत्रु को
महाबाहो
हे महाबाहु (अर्जुन)
कामरूपम्
काम के रूप वाले
दुरासदम्
दुर्जय — जीतना कठिन

यह तीसरे अध्याय का अंतिम और सबसे शक्तिशाली श्लोक है। कृष्ण कहते हैं — बुद्धि से परे आत्मा को जानो, आत्मा से मन को दृढ़ करो और फिर काम रूपी शत्रु को जीतो।

'दुरासदम्' — जीतना कठिन, पर असंभव नहीं। आत्मज्ञान ही वह हथियार है जिससे काम को जीता जा सकता है। यह शत्रु बड़ा है — पर आत्मा उससे भी बड़ी है।

यह 3.42 की सीढ़ी का अंतिम पड़ाव है। पूरा अध्याय इसी ओर बढ़ता रहा — कर्म, यज्ञ, लोकसंग्रह, आत्मज्ञान — सब मिलकर काम को जीतने की राह बनाते हैं।

चौथा अध्याय 'ज्ञानकर्मसंन्यासयोग' इसी आत्मज्ञान की और गहरी व्याख्या लेकर आता है।

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