📿 श्लोक संग्रह

इन्द्रियाणि पराण्याहुः

गीता 3.42 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥
इन्द्रियाणि
इंद्रियाँ
पराणि
श्रेष्ठ — शरीर से परे
आहुः
कहते हैं
इन्द्रियेभ्यः परम्
इंद्रियों से परे
मनः
मन
मनसः तु परा
मन से परे
बुद्धिः
बुद्धि
यः बुद्धेः परतः
जो बुद्धि से भी परे है
तु सः
वह (आत्मा है)

यहाँ एक सीढ़ी बनाई गई है — शरीर से इंद्रियाँ श्रेष्ठ, इंद्रियों से मन श्रेष्ठ, मन से बुद्धि श्रेष्ठ, और बुद्धि से भी परे जो है — वह आत्मा है।

यह सीढ़ी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि काम इन सब में बसता है। जब आत्मा की पहचान हो जाती है, तो काम का निवास सब पहचाने जाते हैं। आत्मा काम से परे है — वहाँ पहुँचना ही लक्ष्य है।

यह श्रेणी कठोपनिषद् 1.3.10–11 में भी मिलती है — जहाँ आत्मा को बुद्धि के रथी और इंद्रियों को घोड़े कहा गया है।

3.43 में इसी ज्ञान से काम को जीतने का आह्वान होगा — यह श्लोक उसकी तैयारी है।

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