📿 श्लोक संग्रह

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः

गीता 3.35 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥
श्रेयान्
श्रेष्ठ है
स्वधर्मः
अपना धर्म (कर्तव्य)
विगुणः
गुणरहित, अधूरा
परधर्मात्
दूसरे के धर्म से
स्वनुष्ठितात्
अच्छी तरह किए हुए से
स्वधर्मे
अपने धर्म में
निधनम्
मृत्यु भी
श्रेयः
कल्याणकारी है
परधर्मः
दूसरे का धर्म
भयावहः
भय देने वाला

इस श्लोक में कृष्ण कहते हैं कि अपना कर्तव्य चाहे अधूरा या कमज़ोर हो, फिर भी वह दूसरे के कर्तव्य से बेहतर है। जैसे एक माँ अपने बच्चे को जैसे भी पाल रही है — वह उसका अपना काम है, और वही सबसे सही है। किसी दूसरे की नक़ल करने से कुछ नहीं होगा।

यहाँ 'स्वधर्म' का अर्थ बहुत व्यापक है — अपना स्वभाव, अपनी क्षमता, अपनी ज़िम्मेदारी। हर व्यक्ति अलग है और हर किसी का कर्तव्य अलग है। कोयल गा सकती है, मोर नाच सकता है — अगर कोयल नाचने लगे तो न गा पाएगी न नाच पाएगी।

अंत में कहा गया है कि अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारी है, लेकिन दूसरे का धर्म भय देने वाला है। यह श्लोक हर मनुष्य को अपनी राह पर चलने का साहस देता है।

यह श्लोक गीता के तीसरे अध्याय कर्मयोग से है। अर्जुन का स्वधर्म क्षत्रिय-धर्म (योद्धा का कर्तव्य) है। कृष्ण उन्हें समझा रहे हैं कि संन्यास लेकर भागना उनका स्वधर्म नहीं है।

यही श्लोक लगभग शब्दशः गीता 18.47 में भी दोहराया गया है, जो दर्शाता है कि कृष्ण इस बात को कितना महत्वपूर्ण मानते हैं।

अध्याय 3 · 35 / 43
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