इस श्लोक में कृष्ण कहते हैं कि अपना कर्तव्य चाहे अधूरा या कमज़ोर हो, फिर भी वह दूसरे के कर्तव्य से बेहतर है। जैसे एक माँ अपने बच्चे को जैसे भी पाल रही है — वह उसका अपना काम है, और वही सबसे सही है। किसी दूसरे की नक़ल करने से कुछ नहीं होगा।
यहाँ 'स्वधर्म' का अर्थ बहुत व्यापक है — अपना स्वभाव, अपनी क्षमता, अपनी ज़िम्मेदारी। हर व्यक्ति अलग है और हर किसी का कर्तव्य अलग है। कोयल गा सकती है, मोर नाच सकता है — अगर कोयल नाचने लगे तो न गा पाएगी न नाच पाएगी।
अंत में कहा गया है कि अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारी है, लेकिन दूसरे का धर्म भय देने वाला है। यह श्लोक हर मनुष्य को अपनी राह पर चलने का साहस देता है।