📿 श्लोक संग्रह

मयि सर्वाणि कर्माणि

गीता 3.30 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥
मयि
मुझमें — मुझे
सर्वाणि कर्माणि
सभी कर्म
संन्यस्य
अर्पित करके — सौंपकर
अध्यात्मचेतसा
आध्यात्मिक चेतना से — आत्मज्ञान के साथ
निराशीः
आशा-रहित — फल की चाह बिना
निर्ममः
ममता-रहित — 'मेरा' का भाव छोड़कर
भूत्वा
होकर
युध्यस्व
युद्ध करो
विगतज्वरः
ज्वर — चिंता छोड़कर

यह श्लोक अर्जुन को सीधा संदेश है — और यह गीता के पूरे संदेश का सारांश भी है। सब कर्म ईश्वर को अर्पण करो, निराशी और निर्मम होकर। फिर जो करना है करो — युद्ध हो या कोई भी कर्म।

'विगतज्वरः' — ज्वर यानी व्याकुलता, चिंता। जब कर्म ईश्वर को अर्पित हो जाता है, तो फल की चिंता नहीं रहती। मन शांत होता है — यही आध्यात्मिक स्वास्थ्य है।

यह श्लोक 3.9 ('यज्ञार्थात् कर्म') और 2.47 ('कर्मण्येवाधिकारस्ते') को व्यक्तिगत रूप में प्रस्तुत करता है।

गीता 18.57 में भी इसी बात का विस्तार है — 'मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।'

अध्याय 3 · 30 / 43
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