📿 श्लोक संग्रह

उत्सीदेयुरिमे लोकाः

गीता 3.24 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥
उत्सीदेयुः
नष्ट हो जाएंगे — डूब जाएंगे
इमे लोकाः
ये सभी लोक
न कुर्याम्
न करूँ
कर्म
कर्म
चेत् अहम्
यदि मैं
सङ्करस्य
संकर का — भ्रम का
कर्ता स्याम्
कारण बनूँगा
उपहन्याम्
नष्ट कर दूँगा
इमाः प्रजाः
इन प्रजाओं को

यहाँ कृष्ण एक बड़ी जिम्मेदारी की बात करते हैं। यदि वे कर्म न करें तो पूरा संसार अव्यवस्था में डूब जाएगा। 'संकर' — यानी भ्रम और अव्यवस्था। महान लोगों के कर्म से ही समाज की व्यवस्था चलती है।

यह श्लोक हर उस व्यक्ति के लिए है जो अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहता है। श्रेष्ठ जब कर्म छोड़ते हैं, तो उसके परिणाम पूरे समाज को भुगतने पड़ते हैं।

यह 3.23 का निष्कर्ष है। कृष्ण की यह स्वीकारोक्ति — कि मेरे कर्म न करने से संसार को हानि है — उनकी लोकसंग्रह की भावना दर्शाती है।

गीता 4.7–4.8 में भी कृष्ण बताते हैं कि वे बार-बार प्रकट होते हैं — यह भी उनका लोक-कल्याण का कर्म है।

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