📿 श्लोक संग्रह

यदि ह्यहं न वर्तेयम्

गीता 3.23 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥
यदि
यदि
हि
तो
अहम्
मैं
न वर्तेयम्
न लगूँ — न करूँ
जातु
कभी भी
कर्मणि
कर्म में
अतन्द्रितः
आलस्यरहित होकर — सजगता से
मम वर्त्म
मेरे मार्ग को
अनुवर्तन्ते
अनुसरण करते हैं
मनुष्याः सर्वशः
सभी मनुष्य — हर तरफ से

यहाँ कृष्ण एक सरल तर्क देते हैं। यदि वे — जो सर्वशक्तिमान हैं — कर्म न करें, तो मनुष्य उनके मार्ग का अनुसरण करेंगे और वे भी कर्म छोड़ देंगे। इससे सारी व्यवस्था टूट जाएगी।

'अतन्द्रितः' — बिना आलस्य के। यह शब्द महत्वपूर्ण है। कृष्ण जो कर्म करते हैं, वह सजगता से, पूरे ध्यान से करते हैं — यही आदर्श कर्मयोग है।

यह 3.21 ('श्रेष्ठ का आचरण') का व्यक्तिगत उदाहरण है — कृष्ण स्वयं वह श्रेष्ठ हैं जिनका अनुसरण संसार करता है।

3.24 में इस बात का परिणाम बताया जाएगा — यदि कृष्ण न करें तो संसार में भ्रम फैल जाएगा।

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