📿 श्लोक संग्रह

न मे पार्थास्ति कर्तव्यम्

गीता 3.22 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥
न मे
मुझे नहीं
पार्थ
हे पार्थ (अर्जुन)
अस्ति कर्तव्यम्
कोई कर्तव्य है
त्रिषु लोकेषु
तीनों लोकों में
किञ्चन
कुछ भी
न अनवाप्तम्
न कोई अप्राप्त
अवाप्तव्यम्
प्राप्त करने योग्य
वर्ते एव
फिर भी लगा रहता हूँ
कर्मणि
कर्म में

कृष्ण यहाँ एक गहरी बात कहते हैं। वे कहते हैं — मुझे तीनों लोकों में कुछ भी करना शेष नहीं, कोई भी चीज़ पाने की मुझे जरूरत नहीं — फिर भी मैं कर्म में लगा रहता हूँ।

यह श्लोक 3.20 के जनक-उदाहरण का दूसरा पहलू है — अब कृष्ण स्वयं को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं। जो सर्वशक्तिमान है, वह भी कर्म करता है — तो साधारण मनुष्य को क्यों नहीं करना चाहिए?

यह श्लोक 3.17–3.18 की आत्मज्ञानी-अवस्था का दिव्य उदाहरण है — कृष्ण स्वयं वह अवस्था हैं जहाँ कुछ करना शेष नहीं, पर फिर भी कर्म होता है।

3.23–3.24 में कृष्ण बताएंगे कि यदि वे कर्म न करें तो क्या होगा — इस श्लोक का परिणाम।

अध्याय 3 · 22 / 43
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