📿 श्लोक संग्रह

यद्यदाचरति श्रेष्ठः

गीता 3.21 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥
यत् यत्
जो-जो
आचरति
आचरण करता है
श्रेष्ठः
श्रेष्ठ पुरुष
तत् तत्
वही-वही
एव
ही
इतरः जनः
अन्य लोग
सः
वह
यत्
जो
प्रमाणम्
प्रमाण (मानदंड)
कुरुते
बनाता है
लोकः
संसार
तत्
उसी का
अनुवर्तते
अनुसरण करता है

इस श्लोक में भगवान कृष्ण कहते हैं कि जो लोग समाज में बड़े या सम्मानित माने जाते हैं, उनका आचरण बहुत मायने रखता है। वे जैसा करते हैं, बाक़ी लोग भी वैसा ही करने लगते हैं। जैसे घर में दादा-दादी सुबह जल्दी उठते हैं तो बच्चे भी जल्दी उठना सीखते हैं।

यहाँ 'प्रमाण' शब्द बड़ा महत्वपूर्ण है। श्रेष्ठ पुरुष जो करता है, वही दूसरों के लिए मानदंड बन जाता है। अगर एक शिक्षक समय पर आता है, तो विद्यार्थी भी समय पर आएँगे। अगर शिक्षक ही देर से आए, तो विद्यार्थियों से समय की अपेक्षा कैसे की जाए?

यह श्लोक हर उस व्यक्ति के लिए है जो किसी भी रूप में दूसरों का मार्गदर्शन करता है — चाहे माता-पिता हों, चाहे शिक्षक, चाहे कोई भी बड़ा। आचरण शब्दों से अधिक शक्तिशाली होता है।

यह श्लोक गीता के तीसरे अध्याय कर्मयोग से है। कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि बड़े लोगों की ज़िम्मेदारी बड़ी होती है। अर्जुन एक राजकुमार हैं — अगर वे कर्तव्य से भागेंगे, तो दूसरे भी भागेंगे।

इस श्लोक के बाद कृष्ण स्वयं का उदाहरण देते हैं — वे कहते हैं कि मुझे तीनों लोकों में कोई कर्तव्य नहीं है, फिर भी मैं कर्म करता हूँ, क्योंकि अगर मैं कर्म न करूँ तो सारे लोग भी कर्म छोड़ देंगे।

अध्याय 3 · 21 / 43
अध्याय 3 · 21 / 43 अगला →