📿 श्लोक संग्रह

कर्मणैव हि संसिद्धिम्

गीता 3.20 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥
कर्मणा एव
केवल कर्म से
हि
निश्चय ही
संसिद्धिम्
सिद्धि को — पूर्णता को
आस्थिताः
प्राप्त किया — स्थित हुए
जनकादयः
जनक आदि राजर्षियों ने
लोकसंग्रहम्
लोक-कल्याण को — समाज की एकजुटता को
एव अपि
ही — भी
सम्पश्यन्
देखते हुए — ध्यान में रखते हुए
कर्तुम् अर्हसि
करना उचित है — करना चाहिए

कृष्ण यहाँ एक ऐतिहासिक उदाहरण देते हैं — जनक। जनक एक राजा थे जो ज्ञानी भी थे। उन्होंने राज्य छोड़ा नहीं, कर्म के साथ ही सिद्धि प्राप्त की। यह बताता है कि गृहस्थ जीवन में भी मोक्ष संभव है।

'लोकसंग्रह' — यानी समाज को एकसूत्र में बाँधे रखना, उसकी भलाई करना। यह कर्म का एक और बड़ा कारण है। केवल अपने लिए नहीं, समाज के लिए भी कर्म करना जरूरी है।

जनक की परंपरा महाभारत और उपनिषदों में वर्णित है — बृहदारण्यक उपनिषद् में जनक और याज्ञवल्क्य का संवाद प्रसिद्ध है।

3.21 में 'लोकसंग्रह' का विचार और विस्तृत होगा — श्रेष्ठ पुरुष का आचरण ही समाज का आदर्श बनता है।

अध्याय 3 · 20 / 43
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