यह श्लोक कर्मयोग का सार है। 'तस्मात्' यानी इसलिए — अब तक जो कुछ कहा, उसका निष्कर्ष यह है — अनासक्त होकर कर्म करो। सतत, बिना थके, बिना फल की चिंता के।
'परमाप्नोति' — परम को प्राप्त करता है। यह परम क्या है? मोक्ष, ईश्वर, आत्मज्ञान — जो भी उसके लिए सबसे ऊँचा है। अनासक्त कर्म वह सेतु है जो साधारण जीवन को असाधारण बनाता है।