📿 श्लोक संग्रह

यज्ञशिष्टाशिनः

गीता 3.13 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥
यज्ञशिष्ट अशिनः
यज्ञ का शेष खाने वाले
सन्तः
सज्जन — सदाचारी लोग
मुच्यन्ते
मुक्त होते हैं
सर्वकिल्बिषैः
सभी पापों से
भुञ्जते
भोगते हैं — खाते हैं
ते तु
वे तो
अघम्
पाप को
पापाः
पापी जन
ये पचन्ति
जो पकाते हैं
आत्मकारणात्
केवल अपने लिए

गीता में 'यज्ञशिष्ट' का अर्थ है — वह जो पहले दूसरों को दिया जाए, उसके बाद जो बचे। सज्जन ऐसे ही खाते हैं — पहले अर्पण, फिर भोग। ऐसे लोग सभी पापों से मुक्त होते हैं।

दूसरी ओर — जो केवल अपने लिए पकाते हैं और खाते हैं, वे पाप खाते हैं। यह सिद्धांत बहुत व्यापक है — 'केवल अपने लिए' जीना ही पाप की जड़ है।

यह 3.12 की निरंतरता है। यज्ञ-चक्र में भाग लेने का व्यावहारिक अर्थ यहाँ मिलता है।

भारतीय परंपरा में 'पंचमहायज्ञ' की अवधारणा इसी से जुड़ी है — देव, पितृ, अतिथि, भूत, और मनुष्य — सबके लिए कुछ अर्पित करना।

अध्याय 3 · 13 / 43
अध्याय 3 · 13 / 43 अगला →