यह श्लोक एक सुंदर चक्र बताता है। मनुष्य यज्ञ करे, देव प्रसन्न हों। देव वर्षा दें, अन्न हो, मनुष्य जीएं। यह परस्पर का संबंध है — देना और लेना, एक-दूसरे का पालन करना।
गीता में 'देव' केवल स्वर्ग के देवता नहीं — प्रकृति की शक्तियाँ भी हैं। यज्ञ जब समाज के हित में होता है, तो प्रकृति भी सहयोग करती है — यह परंपरागत दृष्टि है।