📿 श्लोक संग्रह

ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते

गीता 3.1 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥
ज्यायसी
श्रेष्ठ — बेहतर
चेत्
यदि
कर्मणः
कर्म से
ते मता
तुम्हारे मत में — तुम्हारे अनुसार
बुद्धिः
ज्ञान — बुद्धि
जनार्दन
हे जनार्दन (श्रीकृष्ण)
तत् किम्
तो फिर क्यों
कर्मणि घोरे
भयंकर कर्म में — युद्ध में
माम्
मुझे
नियोजयसि
लगाते हो — प्रेरित करते हो

यह तीसरे अध्याय का पहला श्लोक है और यहाँ अर्जुन बोलते हैं। दूसरे अध्याय में भगवान ने ज्ञान की महिमा बताई थी। अर्जुन को लगा — यदि ज्ञान ही श्रेष्ठ है, तो फिर इस भयंकर युद्ध में क्यों उतरूँ? उनका प्रश्न स्वाभाविक है।

अर्जुन भ्रमित हैं — एक तरफ ज्ञान की बात, दूसरी तरफ युद्ध का आदेश। वे कृष्ण को दो नामों से पुकारते हैं — 'जनार्दन' और 'केशव'। यह प्रेम और विश्वास दोनों दिखाता है।

यह श्लोक दूसरे अध्याय के बाद अर्जुन की स्वाभाविक जिज्ञासा है। भगवान ने 2.49 में कर्म को बुद्धियोग से नीचे कहा था — उसी को अर्जुन यहाँ उठा रहे हैं।

तीसरा अध्याय इसी प्रश्न का उत्तर है — ज्ञान और कर्म विरोधी नहीं, पूरक हैं।

अध्याय 3 · 1 / 43
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