📿 श्लोक संग्रह

न हि प्रपश्यामि

गीता 2.8 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्यात् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥
न प्रपश्यामि
नहीं देख पाता
अपनुद्यात्
दूर कर सके
शोकम्
शोक को
उच्छोषणम् इन्द्रियाणाम्
इंद्रियों को सुखाने वाला
अवाप्य
पाकर भी
भूमौ
पृथ्वी पर
असपत्नम् ऋद्धम् राज्यम्
निर्विरोध समृद्ध राज्य
सुराणाम् अधिपत्यम्
देवताओं का आधिपत्य

अर्जुन कहते हैं — मुझे कोई उपाय नहीं दिखता जो इस शोक को दूर कर सके जो मेरी इंद्रियों को सुखा रहा है। यह पृथ्वी पर निर्विरोध समृद्ध राज्य मिल जाए या देवताओं का आधिपत्य भी मिल जाए — तब भी इस दुःख का अंत नहीं होगा।

यह वाक्य बहुत गहरा है। अर्जुन कह रहे हैं — बाहरी चीज़ें इस भीतरी दुःख का इलाज नहीं कर सकतीं। यह वही स्थिति है जब कोई इंसान महसूस करता है कि सब कुछ होने पर भी भीतर खालीपन है।

भगवद्गीता में यह अर्जुन के विषाद की पराकाष्ठा है। वे स्वयं स्वीकार कर रहे हैं कि सांसारिक सुख इस पीड़ा का समाधान नहीं। यही वह बिंदु है जहाँ ज्ञान की आवश्यकता होती है।

इंद्रियों को 'उच्छोषण' — सुखाने वाला — कहना बताता है कि अर्जुन के शोक ने उनकी पाँचों इंद्रियों को जैसे जड़ कर दिया है।

अध्याय 2 · 8 / 72
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