अर्जुन कहते हैं — मुझे कोई उपाय नहीं दिखता जो इस शोक को दूर कर सके जो मेरी इंद्रियों को सुखा रहा है। यह पृथ्वी पर निर्विरोध समृद्ध राज्य मिल जाए या देवताओं का आधिपत्य भी मिल जाए — तब भी इस दुःख का अंत नहीं होगा।
यह वाक्य बहुत गहरा है। अर्जुन कह रहे हैं — बाहरी चीज़ें इस भीतरी दुःख का इलाज नहीं कर सकतीं। यह वही स्थिति है जब कोई इंसान महसूस करता है कि सब कुछ होने पर भी भीतर खालीपन है।