📿 श्लोक संग्रह

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ

गीता 2.72 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥
एषा
यह
ब्राह्मी स्थितिः
ब्रह्म में स्थिति
पार्थ
हे पार्थ (अर्जुन)
न एनाम्
इसे
प्राप्य
प्राप्त करके
विमुह्यति
मोह में नहीं पड़ता
स्थित्वा
स्थित होकर
अस्याम्
इसमें
अन्तकाले अपि
अंत काल में भी
ब्रह्मनिर्वाणम्
ब्रह्म में निर्वाण (मोक्ष)
ऋच्छति
प्राप्त करता है

यह दूसरे अध्याय का अंतिम श्लोक है। कृष्ण कहते हैं — हे अर्जुन, यही ब्राह्मी स्थिति है, अर्थात ब्रह्म में स्थिति। इसे प्राप्त करके मनुष्य फिर कभी मोह में नहीं पड़ता।

और सबसे सुंदर बात — अंत काल में भी यदि यह स्थिति प्राप्त हो जाए, तो ब्रह्मनिर्वाण (मोक्ष) मिल जाता है। अर्थात देर कभी नहीं होती — जीवन के अंतिम क्षण में भी यह ज्ञान मोक्ष दे सकता है।

जैसे एक लंबी यात्रा के बाद जब घर का दरवाज़ा दिखता है — वैसे ही यह श्लोक पूरे अध्याय के अंत में एक आश्वासन देता है कि यह मार्ग मोक्ष तक ले जाता है।

यह सांख्ययोग अध्याय का समापन श्लोक है। कृष्ण ने इस अध्याय में आत्मा का ज्ञान, कर्मयोग, और स्थितप्रज्ञ के लक्षण — तीनों विषय समझाए। अब अंत में कहा — यही ब्रह्म-स्थिति है, यही मोक्ष का मार्ग है।

'ब्रह्मनिर्वाण' शब्द विशेष है — यह बौद्ध शब्द 'निर्वाण' और वैदिक शब्द 'ब्रह्म' दोनों को जोड़ता है, जो गीता की समन्वयवादी दृष्टि दिखाता है।

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