📿 श्लोक संग्रह

रागद्वेषवियुक्तैस्तु

गीता 2.64 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥
रागद्वेषवियुक्तैः
राग और द्वेष से रहित
तु
लेकिन
विषयान्
विषयों में
इन्द्रियैः
इंद्रियों से
चरन्
विचरण करता हुआ
आत्मवश्यैः
आत्मा के वश में
विधेयात्मा
संयमी व्यक्ति
प्रसादम्
प्रसन्नता, शांति
अधिगच्छति
प्राप्त करता है

कृष्ण कहते हैं — जो व्यक्ति राग (आसक्ति) और द्वेष (घृणा) से मुक्त, अपनी इंद्रियों को वश में रखते हुए विषयों में विचरण करता है, वह प्रसाद (अंतरिक शांति) प्राप्त करता है।

यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि कृष्ण विषयों से भागने को नहीं कह रहे। वे कह रहे हैं — संसार में रहो, विषयों का उपभोग करो, लेकिन न उनसे चिपको (राग) और न उनसे घृणा करो (द्वेष)। बस इतनी सी बात।

जैसे पानी में कमल का पत्ता — पानी में रहता है लेकिन भीगता नहीं। वैसे ही संसार में रहो लेकिन संसार चिपके नहीं।

यह श्लोक गीता का एक व्यावहारिक संदेश है — संन्यास लेकर जंगल में जाना ज़रूरी नहीं। संसार में रहते हुए भी शांति मिल सकती है, बशर्ते राग-द्वेष से मुक्ति हो।

इसी 'प्रसाद' (शांति) की व्याख्या आगे 2.65 में की गई है — प्रसाद से सब दुख नष्ट हो जाते हैं।

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