📿 श्लोक संग्रह

क्रोधाद्भवति सम्मोहः

गीता 2.63 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥
क्रोधात्
क्रोध से
भवति
होता है
सम्मोहः
मोह, भ्रम
सम्मोहात्
मोह से
स्मृतिविभ्रमः
स्मृति का भ्रम (भूल जाना)
स्मृतिभ्रंशात्
स्मृति नष्ट होने से
बुद्धिनाशः
बुद्धि का नाश
बुद्धिनाशात्
बुद्धि नष्ट होने से
प्रणश्यति
पूर्णतः नष्ट हो जाता है

यह श्लोक पिछले श्लोक (2.62) की शृंखला को आगे बढ़ाता है। वहाँ बताया गया था कि विषयों के चिंतन से आसक्ति, आसक्ति से काम, और काम से क्रोध पैदा होता है। अब यहाँ बताया गया है कि क्रोध के बाद क्या होता है।

क्रोध से सम्मोह (भ्रम) आता है — जब गुस्सा आता है तो सही-ग़लत की समझ खो जाती है। फिर स्मृति भ्रष्ट होती है — मनुष्य भूल जाता है कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं। फिर बुद्धि नष्ट हो जाती है — और जब बुद्धि ही चली गई तो मनुष्य पूरी तरह नष्ट हो जाता है।

जैसे एक पेड़ की जड़ में दीमक लग जाए तो धीरे-धीरे पूरा पेड़ गिर जाता है — वैसे ही विषयों का चिंतन एक छोटी सी दीमक है जो अंत में पूरे मनुष्य को गिरा देती है। यह श्लोक एक चेतावनी है — मन पर नियंत्रण रखना कितना ज़रूरी है।

यह श्लोक गीता के दूसरे अध्याय से है और 2.62 के साथ मिलकर पढ़ा जाता है। इन दो श्लोकों में कृष्ण ने मानसिक पतन का पूरा नक्शा खींच दिया है — विषय-चिंतन → आसक्ति → काम → क्रोध → मोह → स्मृति-भ्रंश → बुद्धि-नाश → सर्वनाश।

परंपरा में इस शृंखला को 'पतन-परंपरा' कहा जाता रहा है। यह गीता की सबसे व्यावहारिक शिक्षाओं में गिनी जाती है।

अध्याय 2 · 63 / 72
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