इस श्लोक में पतन की सीढ़ियाँ बताई गई हैं। पहले मनुष्य किसी विषय (चीज़ या भोग) के बारे में बार-बार सोचता है। बार-बार सोचने से उसमें आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से तीव्र इच्छा (काम) पैदा होती है। और जब इच्छा पूरी नहीं होती, तो क्रोध आता है।
इसे ऐसे समझो — एक बच्चे ने दुकान में एक खिलौना देखा। पहले बस देखा, फिर उसके बारे में सोचने लगा, फिर उसकी इच्छा तीव्र हो गई, और जब नहीं मिला तो रोने लगा, ज़िद करने लगा। यही क्रम बड़ों में भी चलता है, बस विषय बदल जाते हैं।
कृष्ण यहाँ एक मनोवैज्ञानिक सत्य बता रहे हैं जो हज़ारों साल पहले भी सच था और आज भी सच है। मन पर नियंत्रण न हो तो विचारों की एक शृंखला बन जाती है जो मनुष्य को नीचे खींचती चली जाती है।