📿 श्लोक संग्रह

यततो ह्यपि कौन्तेय

गीता 2.60 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥
यततः
प्रयत्न करते हुए के भी
पुरुषस्य
पुरुष का
विपश्चितः
विद्वान, ज्ञानी
इन्द्रियाणि
इंद्रियाँ
प्रमाथीनि
मथने वाली, विचलित करने वाली
हरन्ति
हर ले जाती हैं
प्रसभम्
बलपूर्वक
मनः
मन को

कृष्ण यहाँ एक ईमानदार सत्य बताते हैं — हे कौन्तेय, प्रयत्न करने वाले विद्वान पुरुष का मन भी ये विचलित करने वाली इंद्रियाँ बलपूर्वक हर ले जाती हैं। यह कोई कमज़ोरी की बात नहीं — यह मानव-प्रकृति की वास्तविकता है।

यह बात बहुत आश्वस्त करने वाली है। जो लोग अपनी इंद्रियों पर काबू नहीं रख पाते वे अकेले नहीं हैं। बड़े-बड़े ज्ञानी भी इस चुनौती का सामना करते हैं। इसीलिए इंद्रिय-संयम के लिए निरंतर अभ्यास जरूरी है।

भगवद्गीता में यह श्लोक इंद्रिय-संयम की कठिनाई को स्वीकार करता है। 2.58 में कछुए की उपमा दी — अब बताते हैं कि यह काम आसान नहीं।

'प्रमाथीनि' — मथने वाली — यह शब्द बताता है कि इंद्रियाँ मन को केवल खींचती नहीं, बल्कि मथ देती हैं, उलट-पुलट कर देती हैं।

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