कृष्ण स्थितप्रज्ञ की और एक पहचान बताते हैं — जो सर्वत्र आसक्ति रहित है, शुभ पाकर अत्यंत प्रसन्न नहीं होता और अशुभ पाकर द्वेष नहीं करता — उसकी प्रज्ञा स्थिर है। यह समता का सबसे सुंदर वर्णन है।
यह भावहीनता नहीं है। स्थितप्रज्ञ महसूस करता है — लेकिन उसके भाव उसे बहाते नहीं। जैसे नाव पानी पर चलती है लेकिन पानी नाव में नहीं आता — वैसे ही स्थितप्रज्ञ संसार में रहता है लेकिन संसार उसके भीतर नहीं आता।