📿 श्लोक संग्रह

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा

गीता 2.54 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥
स्थितप्रज्ञस्य
स्थिर प्रज्ञा वाले की
का भाषा
क्या पहचान है
समाधिस्थस्य
समाधि में स्थित
केशव
हे केशव (कृष्ण)
स्थितधीः
स्थिर बुद्धि वाला
किम् प्रभाषेत
कैसे बोलता है
किम् आसीत
कैसे बैठता है
व्रजेत किम्
कैसे चलता है

अब अर्जुन एक बहुत सुंदर प्रश्न पूछते हैं — हे केशव, जो स्थितप्रज्ञ है, जिसकी बुद्धि स्थिर है, उसकी क्या पहचान है? वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है, कैसे चलता है?

अर्जुन का प्रश्न बहुत व्यावहारिक है — वे केवल सिद्धांत नहीं, व्यवहार जानना चाहते हैं। ज्ञानी व्यक्ति दिखता कैसा है? उसका रोज़मर्रा का जीवन कैसा होता है?

इस प्रश्न के उत्तर में कृष्ण 2.55 से 2.72 तक स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताते हैं — यह गीता के सबसे प्रसिद्ध अंशों में से एक है।

यह श्लोक गीता के दूसरे अध्याय के उत्तरार्ध का आरंभ करता है। पूर्वार्ध में आत्मा का ज्ञान और कर्मयोग बताया, अब उत्तरार्ध में स्थितप्रज्ञ का वर्णन होगा।

अर्जुन के इस प्रश्न को 'स्थितप्रज्ञ प्रश्न' कहा जाता है और 2.55-72 को 'स्थितप्रज्ञ प्रकरण' कहते हैं।

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