कृष्ण कहते हैं — जब तुम्हारी बुद्धि मोह के दलदल को पार कर जाएगी, तब तुम्हें जो सुना जाना चाहिए और जो सुन लिया है — उन दोनों से वैराग्य होगा। 'मोहकलिलम्' — मोह का दलदल — बहुत सटीक उपमा है।
यह वैराग्य संन्यास नहीं है। यह वह स्थिति है जहाँ बाहरी चीज़ों की आसक्ति कम होती है और भीतरी स्पष्टता बढ़ती है। जैसे धुंध छँटने पर रास्ता दिखता है — वैसे ही मोह हटने पर बुद्धि स्पष्ट होती है।