📿 श्लोक संग्रह

कामात्मानः स्वर्गपराः

गीता 2.43 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥
कामात्मानः
कामनाओं से भरे
स्वर्गपराः
स्वर्ग को सर्वोच्च मानने वाले
जन्मकर्मफलप्रदाम्
जन्म-रूपी कर्म-फल देने वाली
क्रियाविशेषबहुलाम्
अनेक विशेष क्रियाओं से भरी
भोगैश्वर्यगतिम् प्रति
भोग और ऐश्वर्य की ओर जाने के लिए

यह श्लोक 2.42 का विस्तार है। कृष्ण उन लोगों का वर्णन करते हैं जो कामनाओं से भरे हैं, जो स्वर्ग को ही जीवन का परम लक्ष्य मानते हैं। वे अनेक विशेष क्रियाओं को बताते हैं जो भोग और ऐश्वर्य की ओर ले जाती हैं — और इन क्रियाओं का फल पुनर्जन्म है।

कृष्ण यहाँ फल की आसक्ति का दुष्चक्र दिखाते हैं। जब इच्छाओं से कर्म करते हैं, तो फल मिलता है — फिर और इच्छाएँ, फिर कर्म, फिर जन्म। यह चक्र निष्काम कर्म से ही टूटता है।

भगवद्गीता में यह श्लोक 2.42–2.44 के खंड का मध्य भाग है। यहाँ वह मानसिकता चित्रित की गई है जो भोग-प्राप्ति को धर्म का उद्देश्य समझती है।

यह किसी परंपरा या ग्रंथ की आलोचना नहीं है — बल्कि एक मानसिक अवस्था का वर्णन है जिसमें साधन ही साध्य बन जाता है।

अध्याय 2 · 43 / 72
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