यह श्लोक 2.42 का विस्तार है। कृष्ण उन लोगों का वर्णन करते हैं जो कामनाओं से भरे हैं, जो स्वर्ग को ही जीवन का परम लक्ष्य मानते हैं। वे अनेक विशेष क्रियाओं को बताते हैं जो भोग और ऐश्वर्य की ओर ले जाती हैं — और इन क्रियाओं का फल पुनर्जन्म है।
कृष्ण यहाँ फल की आसक्ति का दुष्चक्र दिखाते हैं। जब इच्छाओं से कर्म करते हैं, तो फल मिलता है — फिर और इच्छाएँ, फिर कर्म, फिर जन्म। यह चक्र निष्काम कर्म से ही टूटता है।