📿 श्लोक संग्रह

यामिमां पुष्पितां वाचम्

गीता 2.42 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥
याम् इमाम्
यह जो
पुष्पिताम् वाचम्
फूलों-सी आकर्षक बात
प्रवदन्ति
बोलते हैं
अविपश्चितः
अज्ञानी, अल्पज्ञ
वेदवादरताः
वेद-वाक्यों में आसक्त
पार्थ
हे पार्थ
नान्यत् अस्ति इति
इससे परे कुछ नहीं
वादिनः
कहने वाले

कृष्ण कहते हैं — हे पार्थ, जो अल्पज्ञ हैं वे वेद-वचनों में ही आसक्त रहते हैं और फूलों जैसी सुंदर लेकिन खोखली बातें करते हैं। वे कहते हैं — इससे परे कुछ नहीं है। यह संकीर्ण दृष्टि है।

कृष्ण यहाँ वेद की निंदा नहीं कर रहे — वे उस मानसिकता की बात कर रहे हैं जो केवल स्वर्ग-प्राप्ति और भोग को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मानती है। गीता एक ऊँचा लक्ष्य देती है — मोक्ष।

भगवद्गीता में यह श्लोक 2.42–2.44 के एक खंड का भाग है जहाँ कृष्ण उन लोगों की सोच को चित्रित करते हैं जो केवल भोग और स्वर्ग के लिए कर्म करते हैं।

'पुष्पितां वाचम्' — फूलों जैसी बात — यह बहुत सटीक उपमा है। बाहर से आकर्षक लेकिन भीतर से खोखली।

अध्याय 2 · 42 / 72
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