कृष्ण कहते हैं — हे पार्थ, जो अल्पज्ञ हैं वे वेद-वचनों में ही आसक्त रहते हैं और फूलों जैसी सुंदर लेकिन खोखली बातें करते हैं। वे कहते हैं — इससे परे कुछ नहीं है। यह संकीर्ण दृष्टि है।
कृष्ण यहाँ वेद की निंदा नहीं कर रहे — वे उस मानसिकता की बात कर रहे हैं जो केवल स्वर्ग-प्राप्ति और भोग को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मानती है। गीता एक ऊँचा लक्ष्य देती है — मोक्ष।