📿 श्लोक संग्रह

एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये

गीता 2.39 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु ।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥
एषा
यह
ते अभिहिता
तुम्हें बताई गई
साङ्ख्ये
सांख्य में (ज्ञान-मार्ग में)
बुद्धिः
बुद्धि
योगे तु
और योग में
इमाम् शृणु
यह सुनो
बुद्ध्या युक्तः
बुद्धि से युक्त होकर
कर्मबन्धम्
कर्म के बंधन को
प्रहास्यसि
छोड़ दोगे

कृष्ण यहाँ एक संधि-बिंदु पर खड़े हैं। वे कहते हैं — यह बुद्धि तुम्हें सांख्य (ज्ञान-मार्ग) के संदर्भ में बताई। अब योग में इसे सुनो — जिस बुद्धि से युक्त होने पर तुम कर्म-बंधन को छोड़ दोगे।

सांख्य और योग — ये दो मार्ग हैं जिन्हें कृष्ण गीता में प्रस्तुत करते हैं। सांख्य है ज्ञान का मार्ग — यह जानना कि आत्मा क्या है। योग है कर्म का मार्ग — इस ज्ञान के आधार पर कर्म करने की कला।

भगवद्गीता में यह श्लोक एक बड़े बदलाव का संकेत है। 2.11 से 2.38 तक सांख्य-ज्ञान की बात थी। अब 2.39 से कर्मयोग और बुद्धियोग का विवेचन शुरू होगा।

'कर्मबन्धम् प्रहास्यसि' — कर्म-बंधन छूटेगा — यह मोक्ष की दिशा में पहला कदम है। कर्म करते रहो लेकिन उसके फल के बंधन में न पड़ो।

अध्याय 2 · 39 / 72
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